बदलते मौसम में स्वांस सम्बन्धी रोगों से रहें सवधान

वर्षा

ऋतु की विदाई शर्दी का आगमन हो रहा है। बदलते मौसम की दस्तक में जब दिन में गर्मी रात में थोडी ठंड होती है तो मे हवा में नमी की मात्रा बढ जाती है जिससे हवा में प्रदुषण की अधिकता रहती है जो हवा को भारी कर देते है। यह प्रदुषित हवा वातावरण में निचले स्तर पर रहती है जिसमें हम सांस लेते है। प्रदूषन के कण सांस की नली फेफडो की झिल्ली के सम्पर्क में आकर फेफडो की आक्सीजन सोखने की क्षमता को कम कर देती है तथा फेफडो में से बल्गम का श्राव होने लगता है। जिससे खाशी स्वास फूलने की बिमारी होती है। निरन्तर फेफडों पर प्रदूषन का प्रभाव होते रहने से यही बिमारी दमा का रूप ले लेती है। जवानों के मुकाबले बच्चों बुढों में इस बिमारी का प्रभाव अति शिघ्रता से होता है। सोते समय तेज पंखा चलाने अधिक ठण्डा खाने पीने से भी संक्रमण होने की सम्भावना अधिक रहती है।

इस मौसम में रात को सोते समय पूरे कपडे पहन कर सोना चाहिऎ जिससे शरीर का अधिक से अधिक भाग ढका रहे। बासी, ठण्डा खट्टा खाने पीने से बचना चाहिऎ। जहाँ पर अधिक धूल मिट्टी प्रदूषण वाली जगह हो वहाँ पर जाने से बचना चाहिए। बच्चे सोते समय अधिक करवट बदलते हैं इसलिये उनका ज्यादा ध्यान रखना चाहिऎ कि वो उघड ना पायें। होम्योपैथिक दवाईयों द्वारा स्वास सम्बन्धी रोगों का सम्पूर्ण उपचार किया जा सकता है बच्चों की बिमारियों में होम्योपैथिक दवाइयां अधिक तेजी के कार्य करती हैं। जिनमें प्रमुख रूप से ब्रायोनिया अल्बा, आर्सेनिक अल्ब, बेलाडोना, एन्टिम टार्ट, एकोनाइट, आदि उपयोग में लायी जाती हैं। अस्थमा(दमा) होने पर होम्योपैथिक के कुच्छ मदर टिन्चर का मिश्रण निरन्तर लेने से बिमारी का समूल इलाज किया जा सकता

है।

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