हम क्या और क्यों कर रहे हैं |
बुद्धवार 11/6/2008 प्रातः जैसे ही अखबार का पन्ना पलटा एक युवती के अपहरण का समाचार पढा। यह घाटना एक त्यागी परिवार से जुडी होने के करण मेरी रूची इस खबर मे कुछ अधिक ही रही, रात होते-होते इस समाचार की संद्धिग्धता का लडकी की बरामदगी के साथ पटाक्षेप भी हो गया। समचारों में बताया गया कि लड्की का उस मुस्लिम लडके के द्वारा अपहरण किया गया जिससे लडकी ने वर्ष भर पहले शादी कर रखी थी। समझने वाले इस समचार को कैसे समझते हैं यह उन का अपना मत है, मुझे इस की गहराई में जाने की आवश्यक्ता भी नहीं। पूरी खबर जानने के बाद मैं यह सोचने को विवश हो रहा हूं कि हमारी पीढी किस ओर जा रही है, गलती कहां हो रही है?
पद, प्रतिष्ठा, धनवान व बडा आदमी बनने की क्या-क्या कीमत हमको चुकनी पड सकती है यह इस दौड में सम्मलित होने से पहले विचार कर लेना चाहिए। धनवान, पद-प्रतिष्ठावान होना न तो कोई अपराध है न ही कोई दोष है, किन्तु इनको प्राप्त करने का कोई स्पष्ट उद्धेश्य होना चाहिए कि हम यह सब क्यों, किसके लिए और कैसे प्राप्त कर रहे हैं। भौतिकतावाद की दौड़ मैं दौड़ते-दौडते हम अपना उद्देश्य तो ध्यान रखते हैं लेकिन अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। जिसकी परिणीती में परिवार का ताना बाना क्षिन्न-भिन्न होने लगता है, वही परीजन जिनके लिये हम सब कुछ करना चाहते हैं हमारे विरोधी रहते हैं। हम अपनों की सभी आवश्यकता की पूर्ती का माध्यम पैसा व भौतिक सुखसाधन ही समझते हैं तथा उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाते हैं। यही वजह घर में कलह का करण बनती है।जिसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पडता है। बच्चे इस मामले में अधिक संवेदनशील होते हैं उनका अचेतन मन बडों की अपेक्षा अधिक सक्रिय होता है, इसीलिए घर में तथा आस-पास में हो रही घटाओं का बच्चों के मन पर गहरा असर होता है। बच्चे जो कुछ घर में पाना चाहते हैं यदि वह घर में नही मिलता तो उसे बाहर पाने का प्रयास करते हैं। यह सब कुछ वो जानपूछ कर नही करते बल्कि अचेतन मन की सक्रियता के कारण अपने उपर नियंत्रण न होने की वजह से उनके द्वारा स्वतः ही होता रहता है। बच्चों के भटकाव यही सबसे बडा कारण होता है। माता-पिता को यह सोचना चहिऎ कि बच्चों के लिये भौतिक सम्पदा की अपेक्षा सदगुण, सदविचार, सदचरित्र व सुसंकार की सम्पत्ति, अधिक मूल्यवान होती है, जिसका कोइ कभी अहरण नहीं कर सकता।
